वो इश्क़ और वो मोहब्बत : ५

तुम फ़ोन उठा नहीं रही हो और बारिश भी तेज हो रही है। सोचता हूँ कि सो ही लूँ। तुम्हारे दुपट्टे को हौले से उठाता हूँ और तह करके आलमारी के सबसे गहरे खाने में रख देता हूँ।

फिर सोचता हूँ कि एक बार फ़ोन कर ही लूँ। एक बार फिर से फ़ोन लगाता हूँ। पूरी घंटी होती है लेकिन कोई जवाब नहीं मिलता। खीझ होती है लेकिन कर भी क्या सकते हैं। एक बार फिर से कोशिश करता हूँ। अबकी बार अगर जवाब नहीं मिला तो सो ही जाऊंगा। फ़ोन की घंटी बज रही है।

अचानक से दरवाजे पर जोर की दस्तक होती है। दरवाजा खोलता हूँ तो भौंचक्का खड़ा रह जाता हूँ। सामने तुम खड़ी हो। तुम्हारे हाथ में छतरी है । तुमने कपड़े बदल लिये हैं। बाल अब भी खुले हैं। बारिश में भींगे बाल बारिश की वजह से ही सूख नहीं पाये हैं। अब तुम बरामदे के बाहर की तरफ जाकर सड़क पर छतरी का पानी झाड़ रही हो कि कहीं वो अंदर गीला ना कर दे। बारिश अब भी तेज हो रही है और इस वक़्त अंधेरा भी छाया हुआ है। मैं तुम्हें देखते हुए मना रहा हूँ कि तुम्हें फिर से कहीं बारिश गीला न कर जाय। तुम्हें इतने करीब उस हालत में देखकर शायद ही खुद को रोक पाऊँ। तुमने कपडे तो बदले हैं, लेकिन सिर्फ कपड़ों के रंग बदले हैं। घुटने तक खींची हुयी सलवार पहने हुई हो । सुबह भी तो तुमने ऐसा ही सूट पहना था। बस रंग बदल गया है। और दुपट्टा तो अभी भी नदारद ही है।

मैं तुम्हारे बरामदे को ताकता हूँ लेकिन कोई दिखता नहीं है। शायद सब इस बारिश में मजे से सो रहे हैं। मैं तुम्हारे आने की वजह सोच रहा हूँ। शायद अपना दुपट्टा वसूलने आयी हो। लेकिन वो तो अब मिलने से रहा तुम्हें। कि तभी एक गजब की बौछार आकर तुम्हें भिंगो जाती है और तुम पीछे की तरफ भागने के चक्कर में लड़खड़ाकर गिर जाती हो। इस से पहले कि तुम गिर पाओ मैं तुम्हें पीछे से पकड़ लेता हूँ और तुम बस गिरते गिरते रह जाती हो। तुम फिर से वैसी ही भींग चुकी हो जैसे कि सुबह भींगी थी। हाय रे मेघदूत! खजुराहो की मूरत मेरे हाथों में। ये पहली बार हुआ है।

इस से पहले कि मैं खुद गिर जाऊँ तुम संभल कर खड़ी हो जाती हो और चुपचाप मेरे कमरे के अंदर चली जाती हो। मैं बरामदे से झाँक कर देखता हूँ तो गली में कोई नजर नहीं आता। तुम्हारा बरामदा और बालकनी तो पहले से ही खाली है। मैं तुम्हारे चप्पल और छाते को लेकर अंदर चला आता हूँ।

तुम मेरी किताबों की टेबल की बगल में रखी छोटी कुर्सी पर बैठी हो। तुमने अपने हाथ मोड़कर टेबल पर रखे हुए हैं और सर को हाथों पर टिका कर बैठी हुई हो। शायद खुद को छिपा रही हो। चाह कर भी तुम्हें देखने से खुद को रोक नहीं पाता हूँ। मैं अपने बिस्तर पर आकर बैठ जाता हूँ और तुम्हें देखने लगता हूँ। अब भी तुम उसी तरह चेहरा छिपाये बैठी हो। मैं उठता हूँ और अपनी आलमारी से वो मोटा तौलिया निकाल कर लाता हूँ। धीरे से जाकर तुम्हारे पीठ पर तौलिया रखता हूँ और थोड़ा सा सिहर उठता हूँ। जरा सा हाथ छू जाता है तो तुम्हारा बदन काँपता सा महसूस होता है। मैं तौलिये को ठीक से तुमपर फ़ैलाता हूँ और तुम्हारे दोनों कंधे पकड़ कर हौले से उठाता हूँ। बिलकुल एक बच्ची के जैसे तुम बिना किसी विरोध के उठ जाती हो। मैं वो तौलिया तुम्हारे गिर्द लपेट देता हूँ। तुम अब भी काँप रही हो। तुम्हारी कँपकँपी रोकने के लिए मैं तुम्हें अपने आगोश में ले लेता हूँ। कुछ देर यूँ ही दोनों रहते हैं। तुम बैठी हुयी। मैं तुम्हें बाँहो में लिए खड़ा। लेकिन तुम्हारी कँपकँपी रुक नहीं रही है।

मैं तुम्हें कपड़े बदलने को बोलता हूँ। तुम मेरी तरफ देखती हो और सवालिया निगाहें मुझे घूरती हैं। मैं कुछ बोल नहीं पाता। तुम्हारी नजर में पता नहीं क्या है जो मुझे हर बार चुप कर जाती है। मैं चुपचाप अपनी आलमारी की तरफ इशारा कर देता हूँ।
तुम मेरी आलमारी के पास जाकर उसे खोलकर देखती हो और फिर मुझे देखती हो।

अरे वो नहीं। मेरी चादर तुमने लपेट ली है। खैर तुम ज्यादा मायने रखती हो। तुम सब भिंगो दो, कोई गम नहीं। उस चादर से तुम खुद को सुखाने लगती हो और मुझे इशारा करती हो जाने का। मैं चुपचाप रसोई की तरफ चला जाता हूँ।

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