वो इश्क़ और वो मोहब्बत : ६

कहाँ चले गए?

.....

रसोई में जाकर पहले तो कुछ समझ में नहीं आता। फिर सोचता हूँ कि चाय बना लूँ। लेकिन समस्या तो अब भी वहीं है। दूध के अलावा सब है। इधर उधर देखता हूँ और बेकरी वाले बिस्कुट निकाल कर प्लेट में रखता हूँ। कि तभी अचानक से बांछें खिल जाती हैं। दूध पाउडर का एक पैकेट नजर आता है। पिछले हफ्ते ही तो तुम रख गयी थी। तुम भी मेरी आदत से वाकिफ हो।

चूल्हे पर बर्तन में चाय उबल रही है और मैं तुम्हारे असर से निकलने की कोशिश कर रहा हूँ। एक ही दिन में तुम दो बार भींगी हो। और सिर्फ भींगी नहीं हो । तुमने तकरीबन कत्ल कर दिया है मेरा। चाय अब भी उबल रही है। बस रंग बदल गया है। जैसे तुम्हारा बदल गया था, भींगने के बाद।

"कहाँ चले गये?" अचानक से तुम्हारी आवाज़ आती है।

"हाँ! हाँ! आया अभी।" अचानक से मेरी तंद्रा टूटी।

उधर देखा तो पता नहीं कब दाल कुकर में पकने के लिए चूल्हे पर चढ़ गया है। अब वो भी मेरी तरह अंदर ही अंदर उबल रहा है। फर्क बस इतना है कि वो थोड़ी देर में हल्का हो लेगा, लेकिन मेरे अंदर जो उबाल रहा है वो उफान मारेगा, बाहर नहीं आ पाएगा।

चाय पक चुकी है। मैं चाय को दो कपों में निकालता हूँ। ट्रे में कपों के साथ जैसे ही बिस्कुट को रखता हूँ कि कुकर की सीटी बज उठती है। लो, ये तो हो गया हल्का। चूल्हे की आग बुझाकर मैं रसोई से निकल कर कमरे में आ जाता हूँ।

अब ये बर्दाश्त नहीं होगा। तुम मेरे बिस्तर पर बैठी हो। वो नीले रंग का कम्बल तुमने अपने कमर के गिर्द लपेट रखा है। मेरी पीली वाली शर्ट तुमने पहन ली है। और ये शर्ट तो तुम पर ही अच्छी लगती है। या यूँ कहूँ कि इस शर्ट में तुम कुछ ज्यादा ही अच्छी लग रही हो। तुम खुद में ही खोयी, बालों को कंघी कर रही हो। शायद तौलिये से रगड़ा है तुमने अपने बालों को। अब वो उतने गीले नहीं हैं। लेकिन नमी बाकी है और थोड़े उलझे हुए हैं। तुम उस कंघी और अपनी उँगलियों से बालों को धीरे धीरे सुलझा रही हो। मैं चुपचाप टेबल पर ट्रे रख देता हूँ। और उसी कुर्सी पर बैठकर बस तुम्हें देखने लगता हूँ। अब बस तुम्हारे लट सुलझने ही वाले हैं।

तुम हौले से अपने सर को झटका देती हो और बाल सारे अब दूसरी तरफ हो जाते हैं। लगता है जैसे मेघ का कोई टुकड़ा आसमान में अठखेलियाँ कर रहा है। कोई कवि होता तो शायद ये कहता कि चांद के साथ मेघ अठखेलियाँ कर रहे हैं।

"क्या देख रहे हो?" अचानक से तुमने सवाल दाग दिया।

"क.. कुछ नहीं।" मैंने अनजाने में ही झूठ बोल दिया।

"कंघी साफ़ क्यों नहीं करते?"

"..."

तुम कंघी मुझ पर फेंक कर मारती हो और वो मेरी दायीं बाँह से लगकर नीचे गिर जाता है। मैं चुपचाप कंघी उठाकर दराज में डाल देता हूँ। अब तो ये कभी साफ़ की भी नहीं जाएगी। तुम्हारी खुशबू जो बसी है अब इसमें।

"ठण्ड लग रही है, कुछ करो न।" सुनकर अब मुझे कुछ ज्यादा ही प्यार आ जाता है तुमपर।

"अच्छा रुको मैं तुम्हारे....."

"पास आने की जरूरत नहीं है। चाय लाओ उधर से। जब देखो पास आने का बहाना चाहिए तुम्हें।"

"मैं भी यही कह रहा था मालकिन।"

तुम खिलखिला उठती हो और हाथ बढाकर चाय मांगती हो। तुम्हारी इस अदा पर तो मर मिटता हूँ। मैं पूरा ट्रे तुम्हारे हाथों में रख देता हूँ और एक कप उठा लेता हूँ। तुम ट्रे कम्बल पर रख लेती हो और फिर तुम भी चाय उठा लेती हो। तुम चाय भी ऐसे पीती हो जैसे कोई धुन गुनगुना रही हो। और एक हम हैं जो चाय में फूँक मारते हैं तो लगता है जैसे कैसेट अटक गयी हो। तुम धीरे  से एक बिस्कुट उठती हो और उसे चाय में डुबो देती हो। लेकिन जब उसे बाहर निकालना चाहती हो तो वो बाहर नहीं आता। वो बिस्कुट नहीं, मैं हूँ। और वो चाय नहीं, इश्क़ है तुम्हारा।

उस आधे बचे बिस्कुट को तुम सीधे खाने लगती हो। शायद डुबोना तुम्हें पसन्द नहीं। तुम्हें पीसना पसंद है और मुझे पिसना, तुम्हारे प्यार में। डूब तो खैर पहले ही चुका हूँ।

तभी तुम बगल से खींचकर लैपटॉप को सामने ले आती हो। अब दूसरा बिस्कुट उठा लिया है तुमने। और इसे खा नहीं रही हो। कुतर रही हो। इश्क़ में तड़पाना भी तो तुम्हारी फितरत है। लैपटॉप का बटन दबाती हो। लेकिन वो खुलता नहीं। अलबत्ता बगल की बत्ती टिमटिमा कर बैटरी के नहीं होने का एलान करती है।

"चार्ज क्यों नहीं है?" तुम पूछती हो।

मैं सोचता हूँ कि तुम्हारे सामने जब मेरा दम निकल जाता है तो फिर ये बैटरी क्या चीज है।

"चार्जर लगाता हूँ रुको।"

"खुद लगा लूंगी।"

बस यही मैं नहीं चाहता हूँ। तुम थोड़ी सी बल खाती हुई पीछे मुड़ती हो और पहले से ही दीवाल में घुसे चार्जर को खींचकर लैपटॉप से जोड़ देती हो। और फिर सीधी होकर लैपटॉप से छेड़खानी करने लगती हो। जिस अदा से आज तुमने बल खाया है न, क़यामत बस आते आते रह गयी। लैपटॉप शायद चालू हो गया है और चाय ख़त्म। लेकिन बिस्कुट अभी भी बाकी है। और तुम्हारा कुतरना भी। एक ही बार में चबा लो तो अच्छा है। ये धीमे धीमे मारना ठीक नहीं है। तुम कुछ ढूंढ रही हो और मैं तुममें कुछ ढूंढ रहा हूँ। ट्रे में एक बिस्कुट बाकी है। तुम्हारी आधी खायी हुयी। चुपचाप ट्रे उठा लेता हूँ। तुम पता नहीं क्या कर रही हो। हटने का मन तो नहीं होता है लेकिन जाकर ट्रे और खाली कपों को सिंक में डाल देता हूँ। उस आधे बिस्कुट को एक छोटे से डिब्बे में डालकर फ्रिज के ऊपरी खाने के हवाले कर देता हूँ।

कुकर की दाल अब कब गर्म है। कुकर आसानी से खुल जाता है। पूरी तरह हल्का हो चुका है। दाल को पतीले में डालता हूँ।  चावल धुले पड़े हैं। उन्हें कुकर में डालकर चूल्हे को आठ मिनट के लिए लगा देता हूँ। कुछ रिश्तों का वक़्त पहले से ही पता होता है। फिर दाल को तड़का लगाने के लिये कडुआ तेल और लाल मिर्च निकलता हूँ। सच में कुछ कडुआहट रिश्तों में स्वाद ले आती है।

तड़के की आवाज़ जोर से आती है और उस से भी जोर से आती है तुम्हारी आवाज़।

"सुनोSSS। ये क्या है?"

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Comments

  1. गहरी सुकून में हूं उबड़ने मत देना कहानी जारी रखिए गा।। आभार इस कहानी के लिए जो मन को कल्पना की सैर पर लिए जा रहा है।

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  2. अहह
    क्या वर्णन किया है
    ऐसे ही वर्णन आपको सामान्य लेखकों से भिन्न करते हैं
    चलचित्र सी कथा आँखों के समक्ष हर इक दृश्य को यथावत सा प्रस्तुत कर रही हो यही प्रतीति रहती है मानस में
    विशेषतः
    ये बिस्कुट नहीं है ये मैं हूँ
    ये पंक्ति तो किसी को भी घायल करने के लिये पर्याप्त है
    शेष कथा की प्रतीक्षा में

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