वो इश्क़ और वो मोहब्बत : २

शुरुआत से थोड़ा और आगे
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कुछ देर तो फ़ोन के पास ही बैठा रहता हूँ कि तुम्हारा फ़ोन आएगा।

लेकिन फिर थोड़ी देर में समझ आता है कि शायद इतनी जल्दी नहीं आएगा। फ़ोन को वहीं टेबल पर छोड़कर दरवाजे से बाहर निकल कर घर के बरामदे में चला आता हूँ। चुपचाप कुर्सी पर बैठकर तुम्हारे बरामदे को ताकने लगता हूँ।

लगता है कि जैसे बस अभी ही तो तुम निकल कर बरामदे से कमरे के अंदर गयी हो। कमरे के अंदर से निकलते हुए धुंधली सी रौशनी में तुम्हारा बरामदा भी तो तुम्हारी तरह ही खूबसूरत सा दिखता है। और दिखे भी क्यों नहीं! उस बरामदे पर रखी कुर्सी ने तो तुम्हारा दुपट्टा ओढ़ रखा है। वही दुपट्टा जो तुमने तब पहना था जब बारिश में भींगते बचते तुम बरामदे तक पहुंची थी और गीली होने की वजह से कुर्सी पर डाल दिया था। तभी तुम्हारा यूँ बालों को हौले से झटकना याद आ जाता है और मुस्कान की रेखा मेरे चेहरे पर खिंच जाती है।

तुम्हारे दुपट्टे को देख मेरी नीयत ख़राब हो जाती है और मैं गली में दायें-बायें देखकर तसल्ली करता हूँ तो सब लोग अपने अपने घरों में दुबके होते हैं। मैं अपने कदम बढ़ाकर बरामदे से नीचे उतरता हूँ तो शायद बादल भी मेरी गुस्ताखी पर गुस्सा होकर बारिश इतनी तेज कर देता है और मुझे भागकर वापस बरामदे में आना पड़ता है। मेरे तुम्हारे बरामदे के बीच के बारह फ़ीट की दूरी में तीन फ़ीट की दूरी भी पार नहीं कर पाया था और सर पूरा भींग चुका है।

अपने बरामदे में नजर दौड़ती है लेकिन तौलिया नजर नहीं आता। अंदर कमरे में जाता हूँ। बिस्तर पर पड़ा तालिया उठाकर दायीं ओर से बाल को रगड़ना शुरू करता हूँ। अब तौलिये को बायीं और ला ही रहा होता हूँ कि अचानक, टिंग-टंग-टंग-टिंग-टिंग-टिंग-टंग-टंग-टिंग... मोबाइल बज उठता है।

झपट कर फ़ोन उठाता हूँ और हरा बटन दबा कर कान से लगा लेता हूँ। उधर से एक आवाज़ आती है, "हेल्लो! सो गए थे क्या?"

"नहीं तो। तुम्हारे फ़ोन के इन्तजार में था।"

"अच्छा! मेरे फ़ोन करने से पहले क्या कर रहे थे?"

"चोरी करने की कोशिश।"

"कुछ भी! अब बोलोगे कि मेरा दिल चुराने की कोशिश कर रहे थे।"

"नहीं। तुम्हारा दुपट्टा।"

"मेरे घर में घुसे थे क्या?' तुमने चौंकते हुए पूछा।

"नहीं। तुम्हारे बरामदे में कुर्सी पर पड़ा है। लेकिन जैसे ही मैं निकला, बारिश और भी तेज हो गयी। लगता है कि बदल चिढ़ता है मुझसे।"

"बादल की छोडो। ये बताओ कि तुम्हें मेरा दुपट्टा क्यों चाहिए?"

"..."

'बोलो भी! चुप क्यों हो?"

"..."

"कुछ जवाब दोगे?"

"छोडो न! तुम तो मेरे पीछे पड़ गयी इस बात को लेकर। ये बताओ कि आज तुम्हारा एग्जाम कैसा गया?"

"अच्छा गया। और कैसे अच्छा नहीं जाता। तुमने जो पढ़ाया था मुझे। अच्छा सुनो ११ बज रहे हैं। अब अगर मम्मी ने मुझे बात करते सुन लिया तो फिर कुछ और ही सोच लेगी।"

"क्या सोच लेगी?"

"यही कि मेरा तुम्हारे साथ चक्कर चल रहा है।"

"क्यों? नहीं चल रहा है?"

"कल बात करती हूँ। बाय।"

"अरे सुनो न।"

टिक, और फ़ोन कट जाता है। मैं फिर कई बार फ़ोन लगाता हूँ लेकिन हर बार फुल रिंग होकर फ़ोन कट जाता है लेकिन कोई जवाब नहीं मिलता है। मैं समझ जाता हूँ कि तुमने आज फिर से फ़ोन साइलेंट करके रख दिया है और आदतन तुरंत ही गहरी नींद में खो गयी हो।

मैं अपने कमरे और बरामदे की सारी बत्तियाँ बुझाकर सिरहाने रखे टेबल पर मोमबत्ती जलाता हूँ। तकिये के नीचे रखे वॉलेट से तुम्हारी वो फोटो निकालता हूँ जो तुम्हारा फॉर्म भरते वक़्त चुरा कर रख लिया था। उसे देखते देखते कब नींद आती है और मुझे अपने आगोश में ले लेती है पता ही नहीं चलता।

कहानी जारी है। अभी पहले नींद के आगोश से निकल आऊँ।

पिछला भाग: शुरुआत से थोड़ा आगे
अगला भाग: अगली सुबह जब नींद खुली 

Comments

  1. बहुत अच्छी जा रही है

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  2. जैसे जैसे कथा आगे बढ़ रही है भावों पर स्पष्ट पकड़ बनाती जा रही है
    अपने शब्द नहीं शेष हैं अतः आपके ही शब्दों में बस यही कह पाऊंगा आपकी कथा के लिये

    इश्क की वो तन्हा रातें
    गुजरी थी जो संग तेरे
    न हो कर भी थी जो तू
    जागी थी जो साथ मेरे
    शब्द शब्द अभिसिंचित था
    तेरे मौन व्याख्यानों का
    हुआ पल्लवित हर इक कोना
    इश्क से मानस प्रतानों का

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  3. "उस बरामदे पर रखी कुर्सी ने तो तुम्हारा दुपट्टा ओढ़ रखा है। " पंक्ति लाजबाब था। केवल कुर्सी और तन को दुपट्टे से नहीं बाँधा बल्कि पाठकों को भी अपने शब्दों से आपने बाँध दिया। उत्सुकता कायम है देखता हूँ आगे क्या - क्या होता है ?

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