वो इश्क़ और वो मोहब्बत : ३

अगली सुबह जब नींद खुली 
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अगली सुबह जैसे ही नींद खुलती है, खुशनुमा सा एक एहसास होता है। देखता हूँ तो तुम अपनी तस्वीर में से जैसे मुस्कुरा सी रही होती हो। वहीं बगल में पड़ी मोमबत्ती शीशे के गिलास के अंदर से चीख चीख कर कह रही होती है, "अब तो मुझे भी सोने दो। अपनी एकतरफा मोहब्बत में मुझे क्यों जला रहे हो?"

मैं उसे बोलता हूँ, "आग दोनों तरफ लगी है मेरे दोस्त।" और फिर एक फूँक मारकर उसे सुला देता हूँ।

बाहर अभी पूरी रोशनी हुई नहीं है। शायद बादल अभी आसमान से गये नहीं हैं। शायद कालिदास के यक्ष ने उसे तुम्हारे बारे में भी बतला दिया है। मैं मन ही मन उस यक्ष और उसके मेघदूत दोनों पर झल्लाता हूँ।

अब चाय की तलब होने लगी है। उठकर हाथ मुँह धोता हूँ और फ्रिज को दूध की तलाश में खोलता हूँ। लेकिन हाय री मोहब्बत। कल तुम्हें देखने के चक्कर में दूध को फ्रिज में डालना भूल गया था। चूल्हे पर रखे दूध के बर्तन से ढक्कन हटकर नीचे फर्श पर गिरा हुआ है। लगता है बिल्ली गिराकर गयी है। लेकिन हाय री मोहब्बत। तुम्हारे सपनों के आगोश में कुछ ऐसे खोया था कि ढक्कन के गिरने की वो आवाज़ भी मुझे उठा न पायी।

खैर। नींद खोलने को चाय तो चाहिए ही। तो बिना दूध के ही लाल चाय बनाता हूँ। आधी हैंडल वाले कप में चाय डालकर बरामदे में जाकर उसी कुर्सी पर बैठकर तुम्हारे बरामदे का जायजा लेने लगता हूँ। कुछ कपड़े पड़े सूख रहे हैं। हर रोज मेरे उठने से पहले तुम्हारे घर के बरामदे के अंदर बाहर कपड़े सूखने के लिए टंग जाते हैं। इतनी सुबह उठकर कपड़े कैसे धो लेती हो?

यही सब बातें सोचता हुआ मैं तुम्हारे कपड़ो में तुम्हें ढूँढने की कोशिश कर रहा हूँ। वो रात वाला दुपट्टा अब भी वहीं हैं। तुम्हें तो पता है कि मेरी नियत खराब हो चुकी है उस दुपट्टे को देखकर। फिर भी तुमने शायद चुनौती के तौर पर उसे वहाँ रख छोड़ा है। या यूँ समझ लूँ कि प्रणय निमंत्रण है?

सोचता हूँ कि वो दुपट्टा उड़ा ही लूँ। रात की तरह ही दायें बायें देखता हूँ। लेकिन शायद आज भी दुपट्टा मेरे हाथ नहीं आएगा। बगल वाली महतो आंटी अपने चार साल के दुधमुंहे बच्चे को लेकर उसके स्कूलवाली रिक्शा की राह देख रही है। उनके सामने कुछ भी करने का मतलब है, पूरे शहर को खबर देना। मैं मन मारकर खाली कप से चाय सुड़कने लगता हूँ। नजर फिर से तुम्हारे घर के अधखुले दरवाजे की तरफ जमी है।

बरामदे से सर निकाल कर बादल से कहता हूँ, "जब रुके हो तो बरस ही क्यों नहीं लेते! कम से कम तुम तो हल्के हो लोगे।"

बादल भी कभी सुनता है भला। तभी हाथ में पड़ा कप बोलता है, "अपनी मोहब्बत में क्या मुझ दिव्यांग को शहीद करेगा?"

मैं कोई जवाब न देकर उस कप को अंदर रसोई के सिंक में डाल कर फिर से कल वाली किताब लेकर बरामदे में बैठ जाता हूँ। कि तभी तुम्हारी माँ की आवाज़ सुनाई देती है, "जल्दी से जाकर कपड़े ले आ। बारिश होने लगी है।"

नजर उठा कर देखता हूँ तो बारिश घमासान हो रही है और तुम न जाने कब पहुँच चुकी हो और आज बारिश से तुम्हारी जंग चालू है कपड़ों को भींगने से बचाने की। शायद मेघदूत ने मेरी सुन ली है। 

तुम शायद अभी अभी नहाकर निकली ही हो। क्योंकि सलवार सूट तो पहना है। लेकिन, दुपट्टा नदारद है। और बाल भी खुले हुए हैं। भींगे थे या भींग गए हैं, कहना मुश्किल है। तुम्हें देखकर कवियों को खजुराहो की मूरतें याद आ जाएंगी। लेकिन तुम उनसे भी ज्यादा हसीन लग रही हो।

इस बीच पता नहीं कब किताब मेरे हाथों से उतर कर जमीन पर जा बैठी है। कुर्सी ने शायद मुझे जोर का धक्का दिया है और मैं कहीं गिर न जाऊँ इसलिये रेलिंग ने मेरे हाथों को थाम रखा है।

उधर बारिश में भींगी हुई तुम मुझसे करीब आठ फ़ीट की दूरी पर अपने हरे दुपट्टे को तार से उतारती हो और तभी तुम्हारे पैरों के नीचे की जमीन तुम्हें घुमाकर तुम्हारा चेहरा मेरी तरफ कर देती है। तुम मुझे अपलक निहारते देखती हो और भागना चाहती हो। लेकिन आज शायद धरती माँ भी अपने बेटे के पक्ष में ही है। वो हौले से हाथ बढ़ाकर तुम्हारे पैरों को जकड़ लेती है। तुम बेबस खड़ी मुझे और मैं बेसुध खड़ा तुम्हें देखता रहता हूँ। तभी तुम्हारी माँ तुम्हें आवाज़ लगाती है और धरती भी हड़बड़ा कर तुम्हारा पैर छोड़ देती है। तुम हौले से अपने बरामदे पर चली जाती हो। एक बार मुड़कर देखती हो और फिर अपने घर में घुस जाती हो। मैं तुम्हें जाते देखता रहता हूँ। थोड़ी देर ठिठका सा खड़ा रहता हूँ।

अब और दायें बायें नहीं देखना। सीधे उस बारिश से गुजरकर तुम्हारे बरामदे में जाता हूँ और तुम्हारा प्रणय निवेदन उठा लेता हूँ। फिर उसे मोड़कर छिपा लेता हूँ कि कहीं बादल देख न ले। और फिर हौले से तुम्हारे बरामदे से उतरकर गली पार करता हूँ।

अपने बरामदे में आकर तुम्हारे बरामदे को देखता हूँ। तुम्हें वहाँ नहीं पाता हूँ। अचानक से तुम्हारी बालकनी में नजर पड़ती है और तुम वहाँ से मुझे देखकर मुस्कुरा रही हो। इशारों से समझाती हो कि कपड़े बदलूँ और सर सुखाऊँ। तुम्हारा आदेश सर माथे पर।

मैं अंदर आकर बाथरूम चला जाता हूँ। सोचा कि भींग गया तो नहा ही लूँ। तुम्हारा दुपट्टा मेरे बिस्तर पर पड़ा अंगड़ाइयाँ तोड़ रहा है।

Comments

  1. बहुत अच्छी लग रही है ये कहानी

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  2. हर भाग उत्तरोत्तर एक अलग ही भावगंगा में बहाता जा रहा है | शब्द नहीं शेष बचे इस कथा के लिये
    जिन्होंने इश्क को समझा नहीं उन्हें भी इस कथा के रस में विभोर करते जा रहे हैं आप

    ये वो आशाओं के घरौदों और अनुराग की निस्पृह भावानुभूतियाँ हैं जो शायद आज कल के समय में गायब सी हो गयी है

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  3. "प्रियतमा का हर पल इंतज़ार और दिल की बेचैनी" प्यार के महत्वपूर्ण इफ़ेक्ट हैं जो इस तीसरे भाग में महसूस हुआ। दो प्यार करनेवाले के बीच पड़ा यह बादल कहानी को रोमांचित बनाने में अहम् किरदार निभा रहा है।

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