वो इश्क़ और वो मोहब्बत : ९

अचानक से एक हल्की सी आवाज़ सुनाई देती है। पता चलता है कि बिजली जोड़ से कड़की है। तुम जरा सा चौंकती हो और गर्दन हिलती है तुम्हारी। मेरा हाथ सरक जाता है और नीचे आ जाता है। तुम मुझे अपने बायें हाथ की उँगलियों से आज़ाद कर देती हो। वापस से तुम हाथ को धरती पर रख देती हो और उस पर टिक जाती हो। मैं उस हाथ के नीचे दब सा जाता हूँ। उधर तुम्हारा दायाँ हाथ फिर से बर्तनों से उलझ रहा है। मेरी नजर तुम्हारे दायें हाथ के कंगन पर पड़ती है। कुछ छोटे छोटे झूमर लटक रहे हैं उनसे। सफाई से तुम करछी को दाल के बर्तन में घुमाती हो। तुम्हारे हाथों की लचक पर दोनों कंगन भी नाच उठते हैं। ये क्या जिद है तुम्हारी। दोनों हाथों में दो दो कंगन। न ज्यादा न कम। तुमने दायें हाथ में एक धागा बांध रखा है लाल रंग का। कहती हो मन्नत का धागा है। क्या मांगा होगा मन्नत में तुमने। मैं होता तो .....
"कहाँ खोए हो?" सम्मोहन की देवी खुद ही सम्मोहन तोड़ देती है।
"क..कहीं नहीं।"
"खाना खा लो। फिर मुझे जी भर कर देख लेना।"
मेरे होठों पर मुस्कान तैर जाती है और तुम हौले से शर्मा जाती हो। खुद की बातों पर शर्माने की अदा तो कोई तुमसे सीखे। अब अगर और तुम्हें देखा तो तुम फिर जाने की धमकी दोगी।
नीचे थाली की तरफ देखता हूँ। थाली में दाल चावल आ चुका है। एक तरफ तश्तरी में वो पकौड़े पड़े हैं। दूसरी तरफ दो गिलासों में पानी है।
"तुम्हारी थाली कहाँ है?" एक ही थाली देखकर मैं पूछता हूँ।
"मेरे साथ खाने में दिक्कत है क्या तुम्हें?" तुम तुनक कर सवाल देती हो।
"अब गुस्सा न हो।" मैं तुम्हें मनाता हूँ।
"ठीक है। खाना खाओ।" कहकर तुम चावल और दाल मिलाना शुरू करती हो।
मैं भी चावल दाल मिलाता हूँ। भूख जोर की लगी है। खाना शुरू कर देता हूँ। पाँच कौर खा कर छठा कौर मुँह की तरफ ले जाता हूँ कि तभी तुम्हारे चेहरे पर नजर पड़ जाती है। तुम एकटक मुझे घूर रही हो। नजर मिलते ही तुम खिलखिलाकर हँस देती हो, "पकौड़े नहीं खाने क्या?" उधर कौर तो मेरे हाथों में फंसा हुआ लटका पड़ा है मुँह के पास। तुम अपने बायें हाथ से मेरा दायाँ हाथ पकड़ कर मेरे मुँह में ठूँस देती हो। मैं कौर को मुँह में छोड़कर हाथ बाहर ले आता हूँ। कौर अभी चबा ही रहा हूँ और तुम पकौड़े का एक टुकड़ा तोड़ कर मेरे मुँह के पास लाती हो और धीरे से मुझे खिलाती हो। मैं धीरे से तुम्हारी उँगलियों को दांत से दबा देता हूँ, "मम्मी", तुम सिहर कर हाथ खींच लेती हो और फिर पलट कर बायें हाथ का मुक्का मेरे छाती पर मारती हो। इस मुक्के पर मर जाने को दिल चाहता है। तुम ढीठ भी हो। अबकी चावल दाल कौर बनाती हो औऱ बायीं हथेली को मेरे ठोड़ी तले डाल कर दायें हाथ का कौर खिलाती हो।

अगला कौर लेने के लिए थाली की तरफ हाथ बढाती हो। अचानक से सिहर जाती हो। तुम्हारे बाल खुलकर तुम्हारी पीठ पर बिखड़ जाते हैं। तुम हौले से अपने सर को झटका देती और सारे बाल दायीं तरफ से आगे आ जाते हैं। कुछ बाल तुम्हारी कान की बालियों में अटक जाते हैं।

"खुद से खाओ। कोई छोटे बच्चे हो जो मैं खिलाऊंगी?" बोलकर तुम खाना शुरू कर देती हो। मेरी भूख तो पहले ही तुम्हारे हाथों से खाकर मिट गयी है। तुम्हारे नाचते उँगलियों को देख .....

"खा क्यों नहीं रहे?" बिना मेरी तरफ देखे ही कहती हो। शायद तुम्हें पता है कि मैं अब तुम्हारे चेहरे को देख रहा हूँ। तुमने आँखों में काजल नहीं लगा रखा है फिर भी कितनी.....

"खाओ!" अधिकारपूर्ण आदेश मिलता है और मेरी उँगलियाँ खुद ब खुद भागदौड़ शुरू कर देती हैं।

चुपचाप खाना खाकर खत्म करता हूँ। तश्तरी में अब भी पकौड़े बचे हैं और कुकर में चावल भी। कुछ यूँ है जैसे कितना भी हो जाये तुम हमेशा थोड़ी मोहब्बत बचा कर रखती ही हो। मुझे तुम हाथ धोने बोलती हो और खुद जूठे बर्तन उठा कर रसोई की तरफ चल देती हो। मैं रोकता हूँ, "लाओ मैं रख आता हूँ।"

"हाथ धोकर आओ और कुकर रख आओ।" सुनकर मेरी हँसी छूट जाती है। मैं चुपचाप बाथरूम की तरफ चल देता हूँ और तुम रसोई की तरफ चली जाती हो। बाथरूम में जाकर फिर से आईने में नजर पड़ती है। और फिर वो पकते बाल नजर आ जाते हैं। कुछ देर यूँ ही खुद को ताकता रहता हूँ। फिर हाथ पोंछ कर बाहर आता हूँ। देखता हूँ कि तुम टी वी चला कर बिस्तर पर बैठी हो। आसनियों को जगह लगा चुकी हो और सिवाय कुकर के सारे बर्तन हट चुके हैं। मैं मुस्कुराता हुआ उसे उठाकर रसोई में ले जाता हूँ। ये क्या? रसोई का तो काया कल्प हो चुका है।  इधर उधर मस्ती मारने वाले मसालों के डब्बे चुपचाप ताख पर सज धज कर बैठे हैं। सिंक में सिवाय पानी के कुछ बूंदों के कुछ भी बाकी नहीं। बर्तन सब करीने से अपनी जगह सो रहे हैं। लेकिन उधर जब कमरे में बैठी हो तो फिर इन्हें कौन देखे। अरे! वो पकौड़ियों की तश्तरी कहाँ गयी? अच्छा! तुम्हें बहुत पसंद है। पक्का अभी भी खा रही होगी।

बाहर झांककर देखता हूँ तो अभी भी घनघोर बारिश हो रही है। रह रह कर बौछारों में लहर सी उठती है। ध्यान आता है कि चाय बना लूँ। पकौड़े तो हैं ही। चाय फिर उबलने लगती है और उसकी बदलती रंगत देखकर तुम फिर से याद आने लगती हो। अभी सुबह का वो रूप मेरी आँखों से उतरा नहीं है। गनीमत है कि मेरी छत टपकती नहीं है। वरना आज तो कयामत को आने से कोई रोक नहीं पाता। इन्हीं ख्यालों में चाय बन जाती है। सुबह की तरह ही दो कपों में डालकर कमरे में ले जाता हूँ। टी वी पर कोई कार्टून चल रहा है। तुम एकटक उसे देख रही हो। मैं चाय को किताबों की टेबल पर रख देता हूँ। पकौड़ों की तश्तरी तुम्हारे आगे पड़ी है और एक पकौड़ा तुम अपने हाथ में लेकर कुतर रही हो। उसी बिस्कुट की तरह। मैं हौले से जाकर तुम्हारे बगल में बैठ जाता हूँ। मेरे बैठने से बिस्तर में हरकत होती है तो तुम बिना टी वी से नजरें हटाए बोलती हो, "सुनो न!"

"हाँ बोलो न!"

"ऊँह!"

"क्या हुआ?"

"चाय पीनी है। बना दो न! प्लीज!" तुम प्लीज कुछ ज्यादा ही खींच कर कहती हो।

"बदले में मुझे क्या मिलेगा?"

"तुम्हारे पास बैठी हूँ क्या कम है?" तुम टुनक कर कहती हो। तुनकना तुम्हारी फितरत है और तुनकते हुए तुम्हें देखना हमारी मोहब्बत।

"आबरा का डाबरा। चाय लाया बावड़ा।" कहते हुए मैं टेबल से ट्रे उठाकर तुम्हारे सामने रख देता हूँ।

"कब बना लिए?" तुम भौंचक्की रह जाती हो।

"जब तुम सोच रही थी तब।"

"ज्यादा शोखी मत बघारो। खुद बारिश में बिना चाय के रह नहीं सकते और ....."  ये बोलते हुए मुँह बनाती हो।

मैं चुपचाप तुम्हारे चेहरे को देखता हूँ। तुम चाय का कप उठाकर फूंक मारती हो। कहीं तुम्हारी फूंक से चाय उबल न पड़े। फिर थोड़ी सा चाय सुड़कती हो और तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान दौड़ जाती है। जब मुस्कुराती हो तो बायें गाल पर एक गड्ढ़ा सा पड़ता है तुम्हारे। जी चाहता है उसमें कूद कर जान दे दूँ।

"क्या देख रहे हो?"

"गड्ढ़ा।"

"क्यों?"

"कूदना है?"

"क्यों?"

"यूँ ही। मोहब्बत हो गयी है।"

"किस से?"

"तुम्हारे अलावा और किस से हो सकती है?"

"ज्यादा होशियार न बनो। अच्छा सुनो। अब मुझे जाना है।"

"क्यों?"

"क्यों क्या? हमेशा तुम्हारे पास ही थोड़े बैठी रहूंगी।"

"अभी तो आयी हो। अभी ही चल दोगी।"

"अभी आयी हूँ? सुबह आयी थी। दोपहर बीत चुकी है।"

"ऐसा कैसे?"

"तुम तीन घंटे सोये हो।"

"क्या?"

"हाँ।"

"तुम कब उठी?"

"जब तुम्हारा फ़ोन बजा था।"

"मुझे क्यों नहीं उठाया?"

"सोते हुए अच्छे लग रहे थे। और घर भी बिखड़ा हुआ था तुम्हारा। सोचा ठीक ही कर दूँ।"

"..."

"और सुनो, दुपट्टा कहाँ रखा है मेरा?"

"वो नहीं मिलेगा।"

"क्यों?"

"मेरी मर्जी।"

"दो न।" तुम मचल कर कहती हो।

"फिर कभी। सुनो न। आज मत जाओ।"

"दूर थोड़े ही जा रही हूँ। सामने ही तो हूँ।"

"कुछ देर तो और बैठो न।"

तुम मेरे पास सरक आती हो। मेरे बाएं हाथ को उठाती हो और अपने गले के गिर्द लपेट लेती हो।

मैं पहले से ही पीछे दीवाल से टिक कर बैठा हूँ। तुम दीवाल और मेरे ऊपर टिक कर बैठ जाती हो। तुम मेरे दायें हाथ की उँगलियों को अपने बायें हाथ की उँगलियों में उलझा लेती हो। बस अब यूँ ही उलझा रहूँ.......

पिछला भाग 

अगला और अंतिम भाग 

Comments

  1. तारतम्यता का उत्तर नही दिया जा सकता
    और मुख के सौंदर्य का बोध सदैव केशों के निरूपण से ही क्यों बढ़ता है आज तक समझ नही आया
    बहुत ही सटीकता से आगे बढ़ती कथा
    भावनाएँ जागृत कर रही मन में
    सधा हुआ मनमोहक चित्रण है
    अभिव्यंजना में डुबकी लगाता हुआ पाठक कब भाग के अंत में आ जाता है पता ही न चलता

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular Posts