एक गिल्लू मेरा भी

तीन साल पहले वट सावित्री के दिन जब ये बच्चा गिरा हुआ मिला था तब इसकी आँखें भी नहीं खुली थीं। सात दिन तक दूध पिलाया, हर दो घण्टे पर। रात को 8 घंटे छोड़कर। सातवीं रात को इसने एक आँख खोली थी। आठवीं सुबह दूसरी आँख।
आँख खुलते ही गिलहरी के बच्चे को खाना चाहिए होता है। मैंने काजू, मूंगफली, रोटी पराँठा सब दिया, इसने कुछ नहीं खाया। आखिर में बिज़्ज़ू आम पसंद आया इसे। पहली बार आम पर चढ़ कर खाने लगा। मैंने उतार कर बगल कर दिया। फिर उसके बाद हमेशा से बगल में बैठकर ही खाता था।
आम एक महीने में खत्म हो गए तो बड़ी समस्या हो गयी। आम के अलावा कुछ खाता नहीं था। मैंने इसके सामने बैठकर खाना शुरू किया और अपनी थाली में से लेकर एक टुकड़ा पराँठे का इसे दे दिया। मुझे खाते देखकर ये बच्चा भी पिछले पैरों पर बैठकर अगले पैरों से पराँठा पकड़कर खाने लगा। उसके बाद सिर्फ पराँठे खाता था। रोटी कभी नहीं। माँ इसके लिए हर रोज अलग से पराँठा बनाती थी।
बिल्ली के डर से एक पिंजरे में ये बच्चा रहता था। पिंजरे के अंदर झूले टाँग दिए थे मैंने। आफिस से आने के बाद पिताजी टीवी छोड़कर उसके खेल ही देखते रहते हैं। धीरे धीरे वो बच्चा मेरी उँगली से बढ़कर हथेली की साइज का होता जा रहा था।
इसकी एक और आदत थी। मेरे साथ सोने की। जब मैं सोने जाता था तो उंगलियों को मोड़कर उसके लिए हथेली में जगह बना लेता था। वो मेरी हथेली के कोटर में घुसकर तब तक सोता था जब तक मैं जग ना जाऊँ।
मेरे घर से लौटने के एक महीने बाद माँ ने पिंजरा खोलकर उसे आज़ाद छोड़ दिया। एक दो दिन में ही किसी और गिलहरी के साथ घूमने लगा। लेकिन एक आदत हमेशा कायम रखी उसने। माँ के आसपास ही बना रहता था। जिस दिन माँ निकल कर आँगन में नहीं जाती, बहुत शोर मचाता और फिर घर के अंदर आकर माँ को देख जाता। माँ जब सर्दियों में छत पर दोपहर में सोती तो आकर उछल कूद शुरू कर देता।
एक दिन जब मैं छुट्टी में घर गया तो मुझे देखकर एक घंटे तक चिल्लाता रहा था।
लेकिन अब नहीं चिल्लायेगा।
गिलहरी की उम्र ढाई साल ही होती है। वो कहीं आराम से सो चुका होगा। अब उसके बच्चे आते हैं खाना मांगने और माँ से मिलने। और वो भी अगर माँ को नहीं देखते हैं तो सप्तम सुर में शोर मचाते हैं।

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