वो इश्क़ और वो मोहब्बत : १०

मेरे हाथ को दोनों हाथों में लेकर कहती हो, "जाना तो पड़ेगा न। पापा भी आने वाले होंगे।"

"पापा घर में नहीं हैं क्या?" मैं तुम्हारी तरफ देखता हुआ पूछता हूँ।

"नहीं। सुबह ही तो माँ को लेकर नानी के घर जाने के लिए छोड़ने गए हैं।"

"कब?"

"मेरे आने से पहले।"

"ऐसी बारिश में?"

"हाँ। टिकट कट चुकी थी न। अब तो वापस रास्ते में होंगे।"

"..."

"उदास मत हो। मैं यहीं तो हूँ।"

"..."

तुम मेरी चुप्पी सुन लेती हो धीरे से मेरे बायें गाल को चपत लगाती हो और बोलती हो, "ऐसे करोगे तो फिर कभी नहीं आऊंगी।"

सुनकर बरबस ही मेरी मुस्कान छूट जाती है। तुम भी मुस्कुरा उठती हो। मेरे हाथ को हटाती हो लेकिन मैं अपनी पकड़ मजबूत कर देता हूँ। "ऊँह" करके तुम मुझे धक्का देकर उठ जाती हो।

"सुनो। थोड़ी साफ सफाई रखा करो। खास करके किचन को। और हाँ! वो टूटे हुए कप मैंने कचड़े में डाल दिया है और नया सेट निकाल दिया है।"

तुम बोलती जाती हो, "चूल्हे के नीचे भी कभी साफ कर लिया करो। और जब लत लगी है पढ़ने की तो किताबों को सहेजकर रखा करो।" तुम तब तक अपनी चप्पल उठा कर दरवाजे के पास से ले आती हो और बिस्तर पर बैठ कर चप्पल के फीते पाँव में पहनने लगती हो। मैं सरक कर तुम्हारे पास आ जाता हूँ। तुम्हारी बायीं तरफ बिस्तर से पाँव लटका कर बैठ जाता हूँ। दायाँ हाथ उठाकर तुम्हाते दायें कंधे पर रख देता हूँ। तुम जरा प्यार से अपने सिर को मेरे कंधे पर रख देती हो। अपने बायें हाथ को उठाकर मेरे बायें गाल को सहलाती हो और फिर उठ जाती हो। तुम्हें पता है कि अब तुमने कुछ भी बोला तो मैं तुम्हें रोकूंगा और तुम खुद भी जाने की हिम्मत नहीं कर पाओगी। तुम कमरे से निकल कर हाल में पहुंच जाती हो। मैं भी तुम्हारे पीछे पहुँच जाता हूँ। हाल का दरवाजा सीधा बरामदे में खुलता है। तुम दरवाजे के बगल में टँगा हुआ अपना छाता उठाती हो दरवाजा खोलकर अपने घर का मुआयना करती हो। मैं ठीक तुम्हारे पीछे खड़ा हूँ। तुम्हारे घर के बरामदे पर कोई नहीं दिखता है। अभी तुम्हारे पापा आये नहीं हैं। तुम दरवाजे से निकल कर बरामदे में आती हो कि मैं पीछे से तुम्हारा हाथ पकड़ लेता हूँ। तुम वापस अंदर आकर मेरे गले लग जाती हो और फिर यूँ ही मेरे करीब होकर कहती हो, "जल्दी ही आऊंगी न। हमेशा के लिये।"

फिर अचानक से मुझसे दूर होती हो और झटके से बिना छाता खोले ही उस बारिश में भींगती हुई मेरे बरामदे से निकल कर सड़क पर करते हुए अपने बरामदे में पहुँच जाती हो। शायद तुम्हें डर था कि कहीं जा ही न पाओ।

चाभी से दरवाजा खोलकर तुम एक बार फिर पलटती हो और मेरी तरफ देखती हुई खड़ी हो जाती हो। फिर से खजुराहो की मूरत नजर आ रही हो। कुछ देर यूँ ही खड़ी रहती हो। फिर सिहरन सी होती है तुम्हारे शरीर में। ठंड लगती है तुम्हें। मैं तुम्हें जाने का इशारा करता हूँ। तुम फिर से कुछ इशारे उछाल कर, कुछ इशारे संभाल कर घर के अंदर चली जाती हो।

दरवाजा खुला है, लेकिन पर्दा गिरा है। अब तुम्हें देखना मुमकिन नहीं। बादलों ने अपनी धमाचौकड़ी बढ़ा दी है। बिजली दो बार जोर से कड़कती है। शायद उन्हें भी जोड़े पसंद हैं। मैं टेबल पर पड़ी किताब उठाकर अंदर चला आता हूँ। अंदर हाल से गुजरकर दूसरे कमरे में जाता हूँ। वहाँ अब वो कपड़े सूख रहे हैं जो तुमने सुबह भींगने के बाद पहने थे। मैं उन्हें समेट लेता हूँ। इस पहले कि तुम्हारी खुसबू उनसे निकले, उन्हें संभाल कर रख देता हूँ। घर नया सा दिख रहा है। लेकिन कुछ आधा सा लगता है।

फ्रिज के ऊपर वाले खाने में आधा बिस्कुट पड़ा है। घड़ी देखता हूँ। सूरज भी आधा डूब चुका होगा। उधर चांद भी आधा निकला होगा। और मेरा बिस्तर भी आधा खाली रहेगा। मैं चुपचाप जाकर बिस्तर पर बैठ जाता हूँ। जो कंबल तुमने ओढ़ रखा था, उसे खुदपर खींचकर लेट जाता हूँ। उसके अंदर अब भी तुम्हारी खुशबू है।

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Comments

  1. ऐसे कैसे खत्म हो सकता है ये धोखा है

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  2. गजब लिखे हो भइया लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं हुई है , ये तो सिर्फ एक सीन ही हुआ है आगे के भागों का इंतज़ार रहेगा ।����

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  3. क्या बात है भाई! बहुत ही सुंदर, किसी कविता की तरह लिखी है। लेखन की खूबसूरती यह है कि जिसे कभी भी मुहब्बत नहीं हुई हो, उसे भी मुहब्बत का एहसास हो जाता है। पर भाई, प्यार अंजाम तक न पहुंचे तो कहानी अधूरी ही लगती है।

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