उफनती जवानी के नाम एक खत

प्रिय छोटे भाई/बहन
अब तुम जवानी की दहलीज पर हो। कॉलेज में जाते ही लगेगा, जैसे कि कोई किला फतह कर लिया हो तुमने। लेकिन संभल कर। तुरंत जीती जंग के बाद हारने के खतरा बढ़ जाता है। जवानी की फिसलन, काई की फिसलन जैसी होती है। एक बार गिर गए, तो संभलना मुश्किल है। मेरे बुजुर्गों ने भी मुझे यह समझाया था। लेकिन, तब उनके सफ़ेद बाल देखकर मैंने भी सोचा था कि उन्हें क्या पता कि जवानी क्या होती है? वही तुम भी सोच रहे होगे, मेरे सफ़ेद बालों को देखकर। लेकिन हक़ीक़त तो यह है कि हमारे बाल भी कभी काले हुआ करते थे, और हमारे बुजुर्गों के भी।

हमने भी उनके सफ़ेद बालों से धोखा खाया था और तुम भी मेरे सफ़ेद बालों से धोखा खाओगे। लेकिन क्या करें! बुजुर्गों का बच्चों से यह संवाद चलता आया है, और चलता रहेगा। तो मैंने भी सोचा कि कुछ काम की बातें बतला दूँ। कुछ बातें मेरे बुजुर्ग कह गए, और कुछ बातें तुम्हारा बुजुर्ग कह रहा है।
ये वो वक़्त है, जब तुम्हारे अच्छे दोस्त बनेंगे, और बुरे भी बनेंगे। दोनों को पहचानना जरुरी है। कहते हैं, सौ अच्छे दुश्मन एक बुरे दोस्त से अच्छे होते हैं। दोस्त ऐसे बनाओ जो वक़्त पर काम आये, और खुद भी ऐसे दोस्त बनो जो वक़्त पर काम आओ। तुम्हारे पैसे से खाना खाने वाले बहुत से दोस्त मिल जाएंगे। लेकिन ऐसे दोस्त ढूंढो, जो तुम्हारे लिए अस्पताल में तब भी रहे जब वह खुद बीमार हो। जैसे कि दीपक मिश्रा। उसकी बात न करो तो ही अच्छा है। एक दिन मैंने दरवाजे पर लिख रखा था, "आज मेरा मूड ख़राब है, कोई परेशान ना करे।" सब तो लौट गए, लेकिन जब मिश्रा आया तो उसने वो कागज उखाड़ लिया, और अंदर आकर पूछता है, “इतने घटिया ढंग से क्यों लिखते हो?”
एक बात बोलूँ तो बुरा मानने से पहले सोचना। कॉलेज में अक्सर प्यार हो ही जाता है बच्चों को। लेकिन ध्यान रखना कि जिसे तुम प्यार समझते हो वो प्यार नहीं, झटका है। जब भी हम किसी चीज को पहली बार देखते हैं तो झटका लगता है ना, वही वाला। प्यार जरूर करना, लेकिन पहले प्यार को पकने का वक़्त देना। पहले दोस्ती करो। कुछ महीने एक दूसरे को समझो। जब कुछ महीने बीतने पर लगे कि सामने वाला अच्छा है तो कर दो इजहार। लेकिन कुछ वक़्त जरूर देना खुद को फैसला करने से पहले। क्योंकि प्यार प्लम केक की तरह होता है। पहला कौर तो इतना अच्छा लगता है कि हम ढेर सारा एक ही बार में ले लेते हैं। लेकिन जब दो चार कौर खा लेते हैं तो स्वाद अचानक से बदल जाता है। तब महसूस होता है कि इतना ज्यादा मीठा खाने लायक नहीं होता। फिर उस पूरे केक को जबरदस्ती ठूँसना पड़ता है। फेंक भी नहीं सकते कि कहीं सामने वाले को बुरा ना लग जाये।
आज के लिए बहुत लिख दिया। बाकी बातें अगले खत में या मिलने पर। ठीक?

तुम्हारा बड़ा भाई

Comments

  1. प्रिय बड़े भाई ,
    बहुत अच्छा खत भाई , एकदम सही पते पर पहुंचा है , शायद मैं भी इसी बीमारी से ग्रसित हूँ , या कहूँ था अब नहीं हूं , कोशिश जारी है बाहर निकलने की , बहुत मदद की है आपने इसमें आपकी और अपने बाकी शुभचिंतकों की आशाओं पर खरा उतरने की पूरी कोशिश करूँगा ।।
    बहुत धन्यवाद आपका ,
    आपका अनुज- विशाल साहिल

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  2. आदरणीय अग्रज,
    समस्त अनुज
    जीवन की अपार सम्भावनाओ में, जुगुप्साओं में भटकते अटकते, आगे बढ़ते मन को सम्भालना है हमें। हमारा मन हमें अव्यक्त, अनूठे, अद्भुत संसार की ओर आकर्षित करने को बहुत ही आडम्बर रचता है। मन और मानस का संघर्ष कभी अच्छा नही होता किन्तु आवश्यक अवश्य होता है।
    ऐसा वय जिसमें भावनाओं की बाढ़ आ जाती है, समझने की शक्ति विकास के अनुक्रम में तीव्र गति से आगे बढ़ती है उस समय हमें सर्वाधिक आवश्यकता होती है अनुभव की, ज्ञान की और दूसरों के अनुभव से प्राप्त ज्ञान ही इसे सहज बनाता है क्योंकि आपके पास इतना समय नही होता कि आप स्वयं सबकुछ अनुभव करो और उस प्रतीति पर आगे बढ़ने का प्रयास करो।
    बड़े भाइयों का अनुभव उससे प्राप्त ज्ञान हमारे लिये अनमोल है, हम बुद्धिशाली हैं तो हमे वास्तविकता में बुद्धि का समुचित प्रयोग करना होगा।
    वैसे भी सर्वोत्कृष्ट उक्ति भी यही कहती है " ये बाल धूप में सफेद नही किये��"
    आपका अनुज आपके ऐसे ही अनुभवों और ज्ञान हेतु आपका कृपापात्र बनता रहे ऐसी स्वयं को शुभकामनाएं।

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