बादल - अभिषेक सूर्यवंशी

लीक से भटका हुआ लेखक

Apr 4, 2018

बादल

उधर बादलों की गरज गूंज रही होगी तेरे तन मन में, इधर ख़ामोशी चीख रही है मेरे अंतर्मन में। 
अभी नाचती होगी तुम झूम झूम कर अपने आँगन में, यही सोच बहल जाता हूँ मैं मन में। 
जब केश घनेरे आ जाते होंगे तेरे अधरों पर, बादल भी मुस्काता होगा बैठ कहीं शिखरों पर। 
जब तुम भींग भींग कर खजुराहो की मूरत सी लगती होगी, हौले से चाँदनी भी कहीं करवट लेती होगी। 
अलसायी नजरों से जब तुम बादल को तकती होगी, अंदर बादल के भी बिजली कौंध उठती होगी। 
देख गति तेरे पैरों की ऐसी सुन्दर, मेघ कहीं बैठा है आकर मेरे अंदर।
कहते क्यों इसे सब तूफानी हैं, ये तो तेरे जुल्फों से झटका पानी है।
एक तू ही है सत्य सनातन मुझको, बाकी सब बातें तो बस आनी जानी हैं।

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