वो इश्क़ और वो मोहब्बत : ८

अचानक से नींद में खलल पड़ता है तो समझ आता है कि मोबाइल बज रहा है। आवाज किधर से आ रही है कुछ समझ नहीं आ रहा है। अच्छी नींद आयी हुई है अच्छा सपना चल रहा है। सपने को रोके रहने की कोशिश में आँख बंद किये हुए ही दायीं तरफ टटोलता हूँ तो हाथ बिस्तर के पार चला जाता है लेकिन मोबाइल नहीं मिलता है। फिर बायीं तरफ टटोलता हूँ, आँखें बंद किये ही। अचानक से तुमसे हाथ छू जाता है। ये नामुराद मोबाइल अभी भी बज रहा है। इधर उधर टटोलते हुए मोबाइल हाथ लगता है। अंदाजे से ही उसका बटन दबाकर कान में लगाता हूँ। आँखें अभी भी बंद ही हैं।

"क्या अभिषेक कुमार जी से बात हो रही है?"

"हाँ। आप कौन?"

"जी मैं सपना बोल रही हूँ। हमारी बैंक आपको क्रेडिट कार्ड देना चाहती है।"

"नहीं चाहिए।" टका सा जवाब देकर मैं फ़ोन काट देता हूँ।

इस सपना के चक्कर में वो सपना आँखों से निकल जाता है। लेकिन नींद अभी भी तेज आ रही है। तुम भी अभी बिस्तर पर ही हो। सोई हुई ही। तो मैं भी उठकर क्या करूँगा। वापस से कम्बल देह पर आ जाता है और नींद अपने आगोश में ले लेती है।

...............

कुछ खटर पटर की आवाज़ आ रही है। मेरी नींद खुल गयी है लेकिन उठने का मन नहीं कर रहा। इस हल्की ठण्ड में कम्बल के अंदर की गर्मी से कौन निकलेगा भला। कि तभी अचानक से ख्याल आता है कि तुम भी तो आज मेरे घर में ही हो। कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम उठ गयी हो और मैं तुम्हारे साथ समय बिताना छोड़कर नींद ले रहा हूँ। जायजा लेने के लिए धीरे से आँख खोलता हूँ। आँख खुली की खुली रह जाती है। मेरे किताब जो कभी इधर उधर फैले हुए थे, वो अब करीने से टेबल पर रखे हैं। लैपटॉप भी अपनी जगह वहाँ बना चुका है। सारे कलम अब साथ खड़े हैं अपने दरबे में। तुम उसी कुर्सी पर बैठी हो जिस पर सुबह बैठी थी। अब तुम फिर से अपने कपड़े पहन चुकी हो। तुम इनमें गजब की खूबसूरत लग रही हो। सच कहूँ तो जो भी पहनो तुम, खूबसूरत ही लगती हो। दराज से कंघी निकाल कर अपने बालों में फेर रही हो। पता नहीं क्यों तुम मेरी तरफ ही घूमकर बैठी हो। बालों को तुमने दायीं तरफ से लाकर सामने रखा हुआ है। अब तो उस कंघी से भी चिढ़ होने लगी है। एक वो है जो तुम्हारे बालों में घूम रहा है और एक मैं हूँ जो पास होते हुए भी कुछ कर नहीं पा रहा हूँ।

कंघी को तुम टेबल पर रखती हो। सर का जरा सा पीछे और सीने को जरा सा आगे करते हुए बालों को दोनों हाथों से समेटती हो। अब बाल सारे पीछे चले गये हैं। और तुम्हारे उरोज..........

कत्ल तो हमारा होना है एक रोज तुम्हारी किसी अदा से। एक हाथ से बालों को जड़ में पकड़ी हुई हो और दूसरे हाथ से उन्हें घुमा कर जूड़ा बना देती हो। तुम्हारे चेहरे पर अजीब सी बेफिक्री है कि जैसे कोई हो ही नहीं इस कमरे में। और सच भी तो यही है। अब सिर्फ तुम हो। मैं तो तुममें ही डूब चुका हूँ। तुम्हारे जूड़े से बंध चुका हूँ।

कंघी को उठा कर उसमें फँसे बालों को निकालती हो और उन्हें लपेटते हुए मुझे देखती हो। मुझे जगा देखकर तुम्हारे होठों पर मुस्कान थिरक जाती है। आँखों ही आँखों में पूछती हो कि क्या देख रहा हूँ मैं। मैं एक धुंधला सा झूठ अपने चेहरे से बोल जाता हूँ, कुछ भी तो नहीं। तुम उन बालों के गुच्छे को वहीं रखे कचड़े के डब्बे में डाल देती हो। धीरे से उठकर मेरे पास आती हो। मेरी तरफ झुकती हो। मेरे बालों में हाथ फेरती हो। बस फेरती रहो न। फिर धीरे से कम्बल को पकड़ती हो और नीचे सरकाती हो। फिर एक झटके से कम्बल हटा देती हो।

"उठो और हाथ मुँह धोकर आओ। खाना लगाती हूँ।"

मैं उठने की बजाय करवट बदल लेता हूँ। आलस नहीं है। बस यूँ ही। कि तभी 'धम्म'। एक घूँसा सा पड़ता है मेरी पीठ पर और आवाज़ आती है तुम्हारी, "मुझे जाना भी है। बहुत देर हो चुकी है।"

तुम मुझे खींचती हो। मैं और भी अकड़ता हूँ। तुम भी समझ रही हो कि वजह क्या है। कि तभी फिर से एक और घूँसा पड़ता है तुम खीज भरी आवाज़ में बोलती हो, "अगर दो मिनट के अंदर हाथ मुँह धोकर नहीं आये तो मैं अभी के अभी चली जाउंगी।"

मरता क्या न करता। मैं चुपचाप उठता हूँ और बाथरूम की तरफ चल देता हूँ। बाथरूम के दरवाजे से पलट कर देखता हूँ तो तुम कमरे से निकल कर जा रही हो। कहीं सचमुच चल तो नहीं दी।

"कहाँ जा रही हो?" मैं पूछता हूँ।

"यहीं हूँ। तुम फ्रेश हो कर आओ न।"

मैं बाथरूम में घुस कर आईने में अपने चेहरे की तरफ देखता हूँ। कुछ पकते हुए बालों पर नजर चली जाती है। ख्याल आता है कि कहाँ तुम षोडशी सी दिखती हो। और कहाँ मैं जवानी में पकते बालों के साथ। तुम मुझसे प्यार कर लो तो सच में प्यार अंधा ही कहलाएगा। मेरी आँखों के नीचे....

"अब क्या अंदर जाकर सो गए? बता रही हूँ मैं चली जाऊँगी।"

आवाज़ सुनते ही मैंने झट से कुल्ला किया और चेहरे को पानी से धोया। भागता हुआ बाहर आया। तुम मुझे देखते ही खिलखिलाकर हॅंस देती हो। "चेहरा तो पोंछ लेते। मैं इतनी जल्दी नहीं जाने वाली"

मुझे भी हँसी आ जाती है, ख़ुशी से। तुम तौलिया लेकर मेरा चेहरा पोंछने लगती हो और मैं तुम्हें बाँहों में भर लेता हूँ। तुम चुपचाप मेरा चेहरा पोंछ देती हो। तौलिये को बिस्तर पर फेंक देती हो। अपने बायें हाथ को मेरे सीने के बीचों बीच रखती हो और इठला कर कहती हो, "सुनो!"

"हूँ।"

"पहले खाना खा लो। प्यार मोहब्बत बाद में।" और फिर मुझे धकेलकर मेरे बाहुपाश से निकल जाती हो।

मेरे बाथरूम से आने तक तो तुम सारा इंतजाम कर चुकी हो। नीचे फर्श पर आमने सामने दो आसनियाँ लगी हैं। तुम्हें मेरी आलमारी में हर चीज इतनी आसानी से कैसे मिल जाती है। दाल और चावल के बर्तन वहीं बगल में रखे हैं। पकौड़ियाँ भी एक छोटी से तश्तरी में ढँक कर रखी हैं। दोनों आसनियों के बीच एक थाली रखी है। मैं एक आसनी पर बैठ जाता हूँ और तुम्हारा हाथ पकड़ कर सामने वाली आसनी पर ले आता हूँ। तुम बल खाती हुई बैठती हो। तुम दोनों पैरों को एक ही तरफ करके बैठ जाती हो। चावल अभी भी कुकर में ही है। कुकर का ढक्कन खोलती हो और ये क्या चावल से तो भाप निकल रहा है। या तो मैं ज्यादा देर सोया नहीं या फिर तुमने खाना फिर से गर्म किया है। तुम चावल को कुकर से निकालकर थाली में रखती हो। मुझे उबासी आ रही है और तुम्हें देखते रहने का मन कर रहा है बस। जितने चावल मैं खा सकता हूँ उतने निकल चुके हैं। उन चावलों को तुम अपनी हथेलियों से थाली में एक ओर धकेल रही हो। और फिर अब उन्हें थपथपा रही हो। तुम्हारी उँगलियों में चिपके चावलों से अब चिढ होने लगी है। मुझसे बेहतर तो ये हैं। कितने करीब हैं तुम्हारे। तुमने नाखूनों में लाल रंग लगा रखा है। अरे नहीं दुसरे नाखून में हरा और तीसरे में नीला है। और सारे नाखूनों पर सफ़ेद धारियाँ भी डाली हैं। तुम्हारी उँगलियों को छूने का मन करता है लेकिन ऐसा किया तो तुम भड़क जाओगी। तुम्हें बिलकुल पसंद नहीं कि काम करते वक़्त कोई तुम्हें डिस्टर्ब करे। मैं तुम्हारे दुसरे हाथ की ओर देखता हूँ जो तुमने फर्श पर टिका रखा है। हमेशा सोचता था कि तुम किसी काम में दोनों हाथ क्यों नहीं लगाती। आज अच्छा लग रहा है। मैं धीरे से अपना हाथ बढाकर तुम्हारी उँगलियों को छूता हूँ। तुम पहले तो अपने बायें हाथ को देखती हो, फिर मुझे देखती हो। और अपना भार हाथ से हटा कर कमर पर डाल लेती हो। हाथ को फर्श से उठा लेती हो। मुझे कुछ समझ नहीं आता है कि क्या गलत कर दिया मैंने। क्या तुम्हें छू भी नहीं सकता? कि तभी तुम अपनी उँगलियाँ मेरी उँगलियों से उलझा लेती हो। मैं उन्हीं में उलझा हुआ हूँ। तुम उधर दायें हाथ से कुछ कर रही हो। मैं तुम्हारी उँगलियों से उलझा तुम्हारे चेहरे को देख रहा हूँ। चेहरे पर कोई लिपाई पुताई नहीं। फिर भी कितनी खूबसूरत लग रही हो। ज्यों भगवान ने बड़ी फुर्सत में तुम्हें बनाया हो।  तभी तुम्हारी एक लट फिसल कर तुम्हारे चेहरे पर आ जाती है। पता नहीं कुछ बालों को इतना छोटा रखती ही क्यों हो कि वो बंध ही नहीं पाते। मैं अपना हाथ बढ़ाता हूँ कि उस बादल को चाँद से हटा दूँ कि तब तक तुम्हारा दायां हाथ खुद ही आकर उसे हटा जाता है और फिर से चाँद पूरी तरह नजर आ जाता है। लेकिन वो लट भी तुम्हारी ही है। तुम्हारी तरह ही जिद्दी। वापस से चेहरे की तरफ बढ़ती है। ये मौका मैं नहीं छोड़ने वाला। इस से पहले कि तुम्हारा हाथ उठे, मैं उस लट को अपने बायें हाथ की दूसरी ऊँगली से तुम्हारे कानों के पीछे पहुँचा आता हूँ। मेरा हाथ तुम्हारे माथे और कान पर लगते ही तुम सिहर उठती हो। और मेरी तरफ देखने लगती हो। खींचती हैं तुम्हारी आँखें। मैं अपनी नजर तुमसे हटा नहीं पा रहा हूँ।  और मेरा हाथ अब तुम्हारे कान से हटकर गाल पर आ चुका है। मैं हटाना नहीं चाहता। तुम हटाने की कोशिश नहीं कर रही। ये पल बस यूँ ही ठहरा रहे।

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Comments

  1. सर इतनी प्यारी भरी रचना पहले कभी भी नही पड़ी इसको पढ़कर बस में ही मन में मुस्करा कर रह जाता हूँ।आपकी इस रचना को पढ़कर एहसास हो रहा है, कि होंठों पर आने वाली हल्की सी मुस्कान खिलखिला कर दाँत दिखाने वाली हँसी से बेहतर होती हैं और मैं कल से आपकी इस रचना को पढ़ने के बाद मंद ही मंद मुस्करा रहा हूँ।सोच रहा हूँ कि आप कैसे इतनी बारीकियों से उस लम्हे को बयां करते है जिस से हम रीडर्स लोग उस लम्हे को बिल्कुल अंदर तक रूह तक महसूस कर सके।इस पार्ट में सबसे सुंदर लाइन थी 'मैं तुमहारे साथ समय ना बिताकर नींद ले रहा हूँ,आपकी इस रचना को पीडीएफ मैं कन्वर्ट करके अपने दोस्तों में शेयर करूँगा ताकि वो भी इस नज़ाकत भरी प्रेम कहानी को जी सकें।

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद। लेकिन कॉपी न करें। मित्रो को ये पता बता दें। अगर कॉपी होने लगी तो मजबूरन मुझे ब्लॉग लेखन बन्द करना होगा।

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    2. बिल्कुल सर मैं आपकी कही गयी बात का मान रखूंगा।

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