सोनी दी - अभिषेक सूर्यवंशी

लीक से भटका हुआ लेखक

Apr 4, 2018

सोनी दी

बहुत साल हुए गांव से निकले। लेकिन सोनी दी हर रोज याद आती है। सोनी दी कौन? हमारी दीदी, और कौन। मेरे पिताजी शहर आ गए, उनके पिताजी गांव में रह गए। लेकिन मेरा शुरुआती बचपन सोनी दी के सानिध्य में ही गुजरा।
मेरे परिवार में हम चार भाई बहन करीब करीब हमउम्र हैं। भैया, दुर्गा भैया, मैं और छोटी। सोनी दी हम सब से बड़ी हैं। वो हम सब से ज्यादा बड़ी नहीं हैं, लेकिन इतनी बड़ी हैं कि जब मेरी बारी आयी तो वो गोद में उठाने लायक हो गयी थी, और हम अभी भी गोद में उठने लायक ही थे। सो, दी हमें दिन भर गोद में उठा कर घूमती रहती। मुझे अब भी याद है कि एक दिन वो मुझे गोद में लेकर खड़ी थी। बाकी सब बच्चे भी आसपास थे। उन्होंने पूछा, “मुझे कौन मारेगा?”
उनके पूछने भर की देरी थी कि हमने हाथ चला दिया। “हैंss!! कितना हाथ छूट गया है इसका।” इसके बाद भी उन्होंने मुझे गोद से उतारा नहीं। वो हमें फिर भी गोद में लिए घूमती रहती।
थोड़ी धुंधली सी याद आती है कि एक बार गांव के स्कूल में शायद २६ जनवरी की परेड थी। तब तक हम अपने पैरों पर चलने लगे थे (खड़े तो ठीक से आज तक नहीं हो पाए हैं)। दी मुझे साथ लेकर परेड में गयी। वहाँ गए तो लड़के लड़कियों की अलग कतारें थीं। लेकिन न तो मैं दी से दूर रह सकता था, और न दी मुझसे। सो, दी ने मुझे अपने साथ लड़कियों की कतार में खड़ा कर लिया। तब तक उधर से एक लड़का आया और मुझसे ये बोलकर कि मैं गलत लाइन में खड़ा हूँ, खींचने लगा। दी ने देखा तो मुझे वापस खींच कर अपने आगे खड़ा कर लिया और उस लड़के से बोली, “इसको छूआ भी तो हाथ तोड़ दूँगी।” मैं दी के कमर जितना ही था। उन्होंने मेरे दोनों कन्धों पर अपने दोनों हाथ रख दिए और फिर किसी की मजाल नहीं हुई कि मुझे हाथ भी लगाए।
सच कहूँ दी, तो वो दिन ही अच्छे थे। अब ये शहर की भागदौड़ में सब है, बस आप के वो हाथ मेरे कंधों पर नहीं मिलते।

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