वो इश्क़ और वो मोहब्बत : ७

 ये क्या है?

.......

"सुनोSSS। ये क्या है?", तुम कमरे के अंदर से आवाज़ लगाती हो और मैं सिहर उठता हूँ। मेरे कंप्यूटर में तुम्हें क्या मिल गया ऐसा।

मैं दाल को ढँकता हूँ और कुकर का ढक्कन देखता हूँ। वो ठीक से लगा है।

"जल्दी आओ।" फिर से तुम्हारी आवाज़ आती है। मैं भागता हुआ कमरे में पहुँचता हूँ। और पूछता हूँ, "क्या हुआ?"

"तुम्हारे लैपटॉप में मूवी एक भी नहीं है और असाइनमेंट तो चार साल पहले के भी हैं।"

"तुम तो जानती हो कि मैं फिल्में कितनी कम देखता हूँ।"

"तो क्या? मुझे तो देखनी है ना? तुम सिर्फ अपनी सोचते हो।"

"अच्छा, गुस्सा मत हो। यूट्यूब पर देख लो। इंटरनेट तो है ही ना।"

"मुझे आयरन मैन देखनी है।"

क्या सचमुच? तुम आयरन मैन देखती है। प्यार करने की एक और वजह दे दी तुमने आज मुझे।

"अच्छा, वो भी दिखाता हूँ। लैपटॉप इधर लाना।"

"नहीं! तुम इधर आओ।" तुम जरा तुनक कर बोलती हो।

इसे कहते हैं अंधे के हाथ बटेर। मैं तुम्हारे पास ही तो आना चाहता हूँ। जाकर चुपचाप तुम्हारे बगल में बैठ जाता हूँ। थोड़ा सा सटने की कोशिश करता हूँ कि तुम डांटकर फ़िल्म चलाने बोलती हो। तुम भी हद हो न। खुद पास बुलाती हो और खुद ही दूर भगाती हो। देखना एक दिन तुम मेरे पास खुद आओगी।

खैर, मैं लैपटॉप में वो वेबसाइट खोलता हूँ और आयरन मैन ढूंढता हूँ। तुम मेरे कंधे पर सर टिका चुकी हो और एक बच्चे की तरह लैपटॉप को टकटकी लगाकर देख रही हो। एक दिन यही अदा तो मार डालेगी मुझको। उधर तब तक आयरन मैन के सूट ब्लास्ट होने लगे हैं। तभी तुम अचानक से बोलती हो, "आवाज़ सुनाई नहीं दे रही है। हैडफ़ोन दो न।" एक अजब सी कशिश और बच्चों सी जिद है तुम्हारी आवाज़ में। मैंने सुना तो मुस्कुरा उठा। अरे नहीं। आवाज़ सुनकर नहीं। हैडफ़ोन तुम्हारे बायीं तरफ है मैं तुम्हारे दायीं तरफ। मैं तुम्हें अपने दायें हाथ से तुम्हारे सामने की तरफ से समेटता हूँ और बायें हाथ को तुम्हारे पीछे से ले जाकर हैडफ़ोन ले आता हूँ। तुम जरा सा भी विरोध नहीं करती। अभी भी मेरी बाँहों के घेरे में ही हो। धीरे से मैं तुम्हें बाँहों के घेरे से निकाल कर हैडफ़ोन का पिन पहले तो लैपटॉप में लगाता हूँ। फिर हैडफ़ोन को तुम्हारे कानों में लगा देता हूँ। तब तक तुम्हें जम्हाई आ जाती है।

"नींद आ रही है क्या?"

"हूँ" तुम कुनमुनाती हो।

मैं तुम्हारे पीछे तकिए लगा देता हूँ और तुम्हें उस पर सर रखकर सो जाने को बोलता हूँ। लेकिन तुम तो जिद्दी भी हो। सोने की बजाय तुम तकिए की टेक लेकर फ़िल्म देखने लगती हो और एक और उबासी लेती हो। साथ ही कंबल, जो तुम्हारे पीछे झुकने से तुम्हारे नीचे का गया है, को खींच खींच कर बाहर निकलती हो और फिर से अपने पैरों को कमर से जरा नीचे तक ढँक लेती हो। तुम फिर से लैपटॉप की स्क्रीन में खोयी हो और मैं तुममें।

तभी अचानक से मुझे याद आता है कि तुम्हें पकौड़ियां बहुत पसंद हैं। बाहर बारिश और तेज हो चुकी है। तुम्हारे कपड़े कमरे में कहीं दिखाई नहीं दे रहे। अच्छा, वो तुमने दूसरे कमरे में सूखने डाला है और इसलिए तो उस कमरे से पंखे की आवाज़ आयी थी जब हॉल से गुजर रहा था। ठीक है फिर। अब जब तक तुम्हारे कपडे सूखते हैं और तुम्हारा मन नहीं भरता उस लोहे से, मैं पकोड़े ही बना लूँ। वरना तुम्हें जब भूख लगेगी तब मेरी खैर नहीं।

किचन में जाता हूँ तो देखता हूँ कि चावल तैयार हो चुका है। उसे उतारता हूँ और कड़ाही में तेल डालकर चढ़ाता हूँ। नीचे टोकरी से प्याज निकलता हूँ और काटने लगता है। तुम्हें नफरत है प्याज की रुलाने वाली गंध से। लेकिन तुम पकौड़ों की दीवानी हो। अब मिर्च भी कट चुकी है। पता नहीं दोनों में ज्यादा तीखा कौन है। बेसन के साथ बाकी मसाले इनमें मिलाता हूँ। पानी के साथ मिलकर बेसन का घोल तैयार हो चुका है। एक बूँद घोल गर्म तेल में डालता हूँ। वो बूँद तेजी से नीचे जाती है और उस से भी ज्यादा तेजी से ऊपर चला आती है। इस सिर्फ तेल की कड़ाही में ही हो सकता है। इश्क़ की कड़ाही में डूबने के बाद कोई बाहर कहाँ आया।

पकौड़े बन चुके हैं। पतीले में डालकर ढँक देता हूँ और चार पकौड़े एक प्लेट में लेकर कमरे में आता हूँ। लेकिन ये क्या? तुम तो सो चुकी हो। लैपटॉप पर अभी भी फिल्म चल रही है। हैडफ़ोन एक तरफ लुढ़का हुआ है। नहीं। तुमने निकाला नहीं था। तुम्हारे करवट लेने से निकल गया था। तुम्हारी पीठ मेरी तरफ है। तुमने बायीं ओर करवट ले ली है। हैडफ़ोन का तार तुम्हारी दायीं कोहनी में अटका हुआ है। पकौड़ों को किताबों की टेबल पर रख देता हूँ। मैं पहले लैपटॉप का ढक्कन गिराता हूँ, फिर उसका तार छुड़ा कर तुम्हारे हाथ से तार को छुड़ाता हूँ। लैपटॉप और हैडफ़ोन को बिस्तर के बायीं ओर रख देता हूँ। तुम बिस्तर के दायीं और हो। कम्बल ने तुम्हारा साथ छोड़ दिया है। मैं तुम्हारे चेहरे की तरफ जाता हूँ। कुछ जुल्फें तुम्हारे चेहरे पर आ गयी हैं। एक जुल्फ ने तो तुम्हारे ऊपरी होंठ के बायीं तरफ वाले तिल को ढंकने की पूरी कोशिश भी कर ली है। तुमने अपने दोनों हाथों को मोड़कर पेट से सटा लिया है। तुम्हें नींद में भी ठंड लग रही है। मैं हौले से कम्बल को खींच कर कम्बल को तुम्हारे कंधे तक ओढ़ा देता हूँ। गर्माहट का एहसास होने पर तुम खुद को थोड़ा सा ढीला छोड़ देती हो और वो जुल्फ भी तुम्हारे चेहरे पर  थोड़ी सी जगह बनाकर मुझे देखने का मौका दे ही देते हैं। मैं कुछ देर तुम्हारे बगल में बैठा तुम्हारे हाथ पर हाथ रखे तुम्हें निहारता रहता हूँ।  तभी पकौड़ियों की याद आती है जो टेबल पर पड़े हैं।

उन पकौड़ियों को भी उनके कुनबे में छोड़ आता हूँ और आकर बिस्तर पर बायीं तरह लैपटॉप खोलकर बैठ जाता हूँ।  फिल्म वहीं से शुरू होती है जहाँ तुम छोड़कर गयी थी। कुछ देर देखने के बाद मुझे भी नींद आने लगती है।  बिस्तर पर बैठे हुए ही लैपटॉप को किताबों वाली टेबल पर रख देता हूँ। वो कम्बल तो तुम ओढ़े पड़ी हो। आलमारी में जाकर दूसरा कंबल जो उसी रंग का है, निकाल लाता हूँ। अब मेरा सर तकिये पर है। दायीं करवट और नीला कम्बल। बाहर से अब बारिश के आवाज़ के साथ मेढ़क की आवाजें भी आने लगी है। बारिश की गति में उतार चढाव है, लेकिन आवाज़ में एक लय है जैसे कि कोई संगीतकार आज पानी को अपना यंत्र बना बैठा हो।

कमरे में तुम्हारे होने का एहसास और बाहर से आती नैसर्गिक संगीत की आवाज़। और क्या चाहिए सुकून के लिए। बस इन्हीं एहसासों में कब आँख लग गयी, पता नहीं।

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Comments

  1. अब तो सुनिश्चित सा होने लगा है की ये आपके स्वयं के अनुभव हैं जिन्हें इतनी विहंगमता से चित्रित कर रहे हैं आप
    विशेषतः
    इश्क़ की कड़ाही में डूबने के बाद कोई बाहर कहाँ आया।
    जैसी पंक्तियाँ अनुराग के सागर में डोल रहे व्यक्ति को भी मत्त करने को पर्याप्त हैं
    बहुत ही सुगढ़ कथा
    अगले भाग की प्रतीक्षा में

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  2. अति उत्सुक, अतिशीघ्र अगले घानी में से पकोड़ा मेरे लिए पैक कर दे।

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