पाठक का दुःख - बूढ़ा बरगद

वह जो किस्सों से भी पुराना है

May 20, 2018

पाठक का दुःख

बहुत सी बातें हैं लुग्दी और साहित्य के बीच। लेकिन ये बात कुछ दुःखद है।

आबिद रिज़वी जी को पढ़ते हुए पता चला कि लुग्दी ने इतनी पकड़ कैसे बना ली। अहम बात थी उपलब्धता। उनके जवानी की बात नहीं करूँगा। वो तो बरगद हैं और मैं नया निकला बबूल का झाड़। कुछ साल पहले की ही बात करता हूँ।

साहित्य की किताबें अच्छी कागजों पर खर्चीले ढंग से छपती थीं। महंगी भी होती थी और शायद प्रकाशकों को डर था कि पता नहीं कितनी बिकेगी। डर जायज भी था। इतनी महँगी किताब कौन खरीदेगा। मेलुहा के मृण्त्युंजय जहाँ ढाई सौ के आसपास होगी, वहीं लुग्दी वाली कोई भी बीस से चालीस रुपये की होगी। लेकिन ये वाजिब भी थी। लुग्दी बनती ही थी इस बात के लिए कि अगले महीने उस किताब को कोई नहीं पढ़ेगा। तो कागज की गुणवत्ता का कोई मतलब नहीं रहता था। वहीं दूसरी ओर साहित्य को संभाल कर रखना होता है। तो वैसे कागजों पर खर्च तो होता ही।

कल एक लड़के ने जो स्कूल में पढ़ता है, और किताबों का बहुत शौकीन है, ने बताया कि भैया एक किताब पढ़ने का मन है लेकिन दाम बहुत है तो खरीद नहीं पा रहा हूँ।

"क्यों? किंडल पर पढ़ लो न?"

"किंडल पर भी उतनी ही है जितनी पेपर में है। लेखक महोदय से पूछा तो बोले कि 180 से कभी कम नहीं होगा। अब बताइये कि इतनी महँगी किताब कैसे पढ़ें।"

मैंने इसके आगे चुप रहना ही मुनासिब समझा। लेखक का नाम पूछकर क्या करता।

खैर, मेरा अपना विचार है कि किताबें मुफ्त में नहीं देनी चाहिए, लेकिन इतनी भी महँगी न हो जाये कि आमजन तक पहुँच ही न पाए। वैसे भी लेखक महोदय, किताबों की कमाई से तो आप अमीर बनने से रहे। कम से कम प्यार ही कमा लीजिये लोगों से।

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