ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥ - बूढ़ा बरगद

वह जो किस्सों से भी पुराना है

Aug 21, 2018

ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥

भड़क उठने से पहले पूरा पढ़ें।

पहले बात करते हैं रामायण और रामचरितमानस की। दोनों में अंतर है। थोड़ी कथा में और बहुत उद्देश्य में।

रामायण और रामचरितमानस, दोनों के नायक भगवान श्रीराम हैं। लेकिन रामायण मूल कथा है जिसके बारे में यह विश्वास किया जाता है कि भगवान राम के जीवन की गाथा जस की तस रख दी गई है। रामायण के राम, मर्यादा पुरुषोत्तम राम हैं। उनके जीवन में दो चीजें मूल रहीं, पहली मर्यादा और दूसरी व्यक्ति का आचरण।

रामायण में यह दिखाया गया कि एक व्यक्ति का आचरण भिन्न-भिन्न परिस्थितियों और किरदारों में क्या होना चाहिए।

जब भगवान राम गुरु विश्वामित्र के साथ मिथिला जाते हैं तो वे स्वयंवर से पूर्व ही माता सीता को देख कर कर मोहित हो जाते हैं, परंतु स्वयंवर के समय वे तब तक सामने नहीं आते जब तक कि गुरु विश्वामित्र उन्हें ऐसा करने का आदेश नहीं देते। यह एक शिष्य के रूप में उनका आचरण दिखाता है।

आगे राज्याभिषेक से पहले जब उन्हें पता चलता है कि महाराज दसरथ महारानी केकैयी के वचन से बंधे हैं तो बिना महाराज से आज्ञा लिए हुए ही वे वन प्रस्थान कर जाते हैं। जबकि महाराज खुद कहते हैं कि विद्रोह करके राज्य को अपने हाथ में ले लो। लेकिन पुत्र का धर्म पिता के वचन को भी मिथ्या होने से बचाना है, भगवान राम ये बात पुत्र के किरदार में दिखलाते हैं।

इसी तरह एक पति के किरदार में वे रावण से भिड़ जाते हैं और राजा के किरदार में प्रजा को संतुष्ट करने हेतु उसी पत्नी का त्याग कर देते हैं।

लेकिन रामचरितमानस के राम थोड़े से अलग हैं। प्रश्न तो यह है कि रामचरितमानस की रचना ही क्यों की गई जबकि रामायण पहले से ही मौजूद था।

रामचरितमानस की रचना की दो वजहें रहीं। पहली वजह यह कि संस्कृत भाषा आमजन की भाषा नहीं रह गई थी। इसलिए रामकथा को आमजन की भाषा में लाना जरूरी था। उस समय आमजन की भाषा अवधि थी, और हिंदी तब शायद शैशवावस्था में ही थी।

दूसरी बात की रामायण ही क्यों, महाभारत क्यों नहीं?

उस समय भारत पर आक्रांताओं के हमले होते रहते थे तथा आक्रांताओं ने अपनी जड़ें जमा ली थीं, और भारतीय जनमानस को एक नायक की जरूरत थी। अगर रामायण और महाभारत की तुलना करें तो रामायण का नायक एक पुरुष है, पुरुषोत्तम। लेकिन महाभारत का नायक एक भगवान है, भगवान कृष्ण। और आमजन खुद को उसी के ज्यादा करीब महसूस कर पाते हैं, जो उनके जैसा लगता हो।

जाहिर सी बात है कि पैर में खड़ाऊँ पहने, वन-वन पत्नी को ढूंढता हुआ किरदार लोगों के ज्यादा करीब होगा बनिस्पत उस किरदार के जो पत्नी के जिद करने के बाद गरुड़ पर बैठकर हाथ में सुदर्शन चक्र लेकर स्वर्ग पर हमला कर दे।

इसी वजह से तुलसीदास जी ने राम का चरित्र नायक के रूप में चुना। लेकिन नायक ऐसा होना चाहिए कि उसकी बातें लोगों को सही राह दिखाए न कि उनका उद्धरण देकर लोग गलत को भी सही बोलें। रामायण के राम अपनी गर्भवती पत्नी को वन भेज देते हैं, जो कि रामचरितमानस लिखते हुए उद्धृत करता सही नहीं होता। संभव था कि इस प्रसंग का दुरूपयोग होता।

इस वजह से रामचरितमानस में रामकथा का समापन राज्याभिषेक के साथ ही हो जाता है। उत्तरकांड में काक भुसुंडि सुक संवाद है।

लेकिन बाबा तुलसीदास ने स्त्री को ध्यान में रखने के बावजूद एक गलती कर दी। उन्होंने लिख दिया,

"ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥"

इस बात को आधार बनाकर आज रामचरितमानस की भर्त्सना भी करते हैं लोग। वहीं कुछ लोग इन पंक्तियों के अलग अलग अर्थ भी निकालते हैं।

लेकिन क्या सचमुच तुलसी बाबा ने गलती की थी?

मेरे ख्याल से तुलसी बाबा ने गलती नहीं की थी। गलती उनकी है जो इन पंक्तियों के संदर्भ देते हैं। मेरी बात को समझने के लिए ये समझना जरूरी है कि ये पंक्तियां किसने और कहाँ बोली हैं।

किसी भी पुस्तक में लिखे हर पंक्ति का समर्थन न तो लेखक करता है, और न ही हर पंक्ति नायक की कही हुई होती है जो अनुकरण की ही जाए। अगर ऐसा होगा तो रामचरितमानस में राम और रावण विरोधी किरदार रहें हैं तो जाहिर है कि उनके संवाद भी विरोधाभासी रहे होंगे। अब अगर हम हर पंक्ति का अनुकरण करने लगें तो पता चलेगा कि व्यक्तित्व की खिचड़ी बन गई है।

हाँ तो बात हो रही थी ढोल गँवार वाली पंक्ति की।

प्रसंग है कि जब भगवान राम तीन दिन तक समुद्र तट पर विनती करते रहते हैं और समुद्र से जवाब नहीं मिलता तो वे क्रोध में अग्निबाण का संधान कर लेते हैं। तब समुद्रदेवता मनुष्य रूप* में हाथ जोड़ उनके सामने खड़े हो जाते हैं और बौखलाहट में माफी मांगते हुए कई सारी बातें बोलते हैं, जिसमें से एक बात यह भी थी कि ढोल गँवार सूद्र पसु और नारी तो तारण के अधिकारी हैं। इनको बिना डराए काम नहीं होता।

समुद्र ने ये सारी बातें क्यों बोली, क्या आशय था, इनसब में न पड़ते हुए यह सोचिये कि क्या किसी कथा में एक महत्वहीन किरदार की बात महत्वपूर्ण होती है? हो सकता है कि समुद्र ने खुद को बचाने के लिए अनर्गल प्रलाप ही कर डाला हो। नहीं भी किया हो तो उनके वचन को तुलसी वचन या रामवचन मानना कितना उचित है?

अगर हम इन पंक्तियों का संदर्भ भर भी लेते हैं तो पहले स्वयं पर लागू करते हुए स्वयं को ढोल मानना ही उचित होगा।

इति।

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अभिषेक सूर्यवंशी
लेखक - किस्सों की सड़क

*संभव है कि कुछ लोग बोलें कि समुद्र का मनुष्यरूप में आना संभव नहीं है। तो भाई, यह आलेख समुद्रबन्धन प्रसंग पर है न कि रामचरितमानस की वैज्ञानिकता पर। समुद्र का मनुष्यरूप में आना शोध का विषय है। इस विषय पर सवाल है तो कृपया शोध की ओर अग्रसर हों।

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